Friday, November 7, 2025

ज़ीस्त का हासिल बस यही ज़रा सा

ज़िंदगी के मारे  बिखरे हुए हैं 

हम पंख पसरे बैठे हुए हैं 

सूरज ढला, शाम हुई 

रात आयी चांदनी बिखरी 

पुरवाई सनकी दर्द जागा 

सुबह हुई मुर्गा बोला 

सड़कों पर ट्रैफिक मचल रहा है 

 शराब के जाम में बर्फ पिघल रहा है 

उदासी, वीरानी और कुहासा 

ज़ीस्त का हासिल बस यही ज़रा सा  

भीड़तंत्र

     भीड़तंत्र है 

    भीड़ में एक गुर्गा मैं भी हूं 

    नेताजी की जय जय करने वाला 

    एक मुर्गा मैं भी हूं 


जाड़ों में नेताजी के कहने से 

मैंने महंगाई का पुतला फूंका 

और हाथ तापे 

गर्मियों में भृष्टाचार के खिलाफ 

सड़क पर प्रदर्शन किया 

पानी की धार से खदेड़ा गया 


बरसात आयी, बाढ़ लायी 

नेताजी ने कहा दिल्ली चलो 

नई संसद का घिराव करो 

लाखों गांव बह गये 

इनका हिसाब कौन देगा?


बसों में भरकर 

झंडों के डंडे हिलाते 

जा रहे थे सब दिल्ली 

मोबाइल पर नेताजी का 

मेसेज आया :

अब ज़रूरत नहीं है घिराव की 

सब को छोले पूड़ी खिलाओ 

और बस वापस लेजाओ 


हम आगये घर वापस 

झंडे और डंडे समेटे 

अपनी अपनी मज़ूरी लेकर 

अगले दिन खबर छपी 

अपनी पार्टी ने दिया है समर्थन 

और नेताजी बन गए हैं मंत्री 


     भीड़तंत्र है 

    भीड़ में एक गुर्गा मैं भी हूं 

    नेताजी की जय जय करने वाला 

    एक मुर्गा मैं भी हूं 


Wednesday, June 18, 2025

पतझड़ के मौसम


(1)

गली मोहल्ले में  

बच्चे खेलते थे कंचे 

नाक चुआते गंदे लड़के 

उड़ाते और लुटते थे पतंगें. 

घर के आंगन में 

नीम के पेड़ पर बैठकर

 कागा करता था कांव कांव 

गौरैयाँ और गिलहरियां 

छप्पर और खपरैल में 

बनाती थीं घोंसले. 

वो लू भरी दोपहरियाँ 

जब नाचते थे धूल के बवंडर 

बच्चे दौड़कर 

पकड़ते थे उसमें नाचते पत्ते. 

(2 )

वक्त गुज़रा ज़माना बदला 

बच्चे पढ़ लिखकर हुए बड़े 

खेत खलियान बिके 

बनीं कालोनियां और फैक्ट्रियां 

रोज़ी रोटी की चाहत 

कुछ बड़ा करने बड़ा बनने की लालसा 

इन्हें खींच ले गयी बाहर 

(3 )

अब उनके बच्चे 

आकाश से बातें करती 

इमारतों में रहते हैं 

न उनहोंने देखी है लू 

और न पतझड़ के मौसम 

वह तो बेचारे 

बारिश को भी अज़ाब समझते हैं.