Friday, November 7, 2025

ज़ीस्त का हासिल बस यही ज़रा सा

ज़िंदगी के मारे  बिखरे हुए हैं 

हम पंख पसरे बैठे हुए हैं 

सूरज ढला, शाम हुई 

रात आयी चांदनी बिखरी 

पुरवाई सनकी दर्द जागा 

सुबह हुई मुर्गा बोला 

सड़कों पर ट्रैफिक मचल रहा है 

 शराब के जाम में बर्फ पिघल रहा है 

उदासी, वीरानी और कुहासा 

ज़ीस्त का हासिल बस यही ज़रा सा  

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