Literature, Short stories, poems, Literary figures
ज़िंदगी के मारे बिखरे हुए हैं
हम पंख पसरे बैठे हुए हैं
सूरज ढला, शाम हुई
रात आयी चांदनी बिखरी
पुरवाई सनकी दर्द जागा
सुबह हुई मुर्गा बोला
सड़कों पर ट्रैफिक मचल रहा है
शराब के जाम में बर्फ पिघल रहा है
उदासी, वीरानी और कुहासा
ज़ीस्त का हासिल बस यही ज़रा सा
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